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बाल विकास गृह
(अनाथाश्रम)

प्रत्येक माँ बाप की आँखों का तारा होते हैं उसके बच्चे. परन्तु कुछ बच्चे ऐसे भी है जो किसी की एक प्रेम और सहानुभूति भरी नजर के लिए तरसते हैं. ये वे बच्चे हैं जिन्हें कई बार हम सडकों, गलियों आदि में आवारा घूमते और भीख मांगते देखते हैं. इनका कोई सहारा नही होता. अनाथ इनका उपनाम होता है. अनाथ होने के पीछे उनकी इच्छा नही होती. ये दुर्घटनावश अपने जन्मदाताओं से दूर हो जाते हैं या साजिशन कर दिए जाते हैं. और परिणामस्वरूप एक गन्दा और निरर्थक जीवन इनका भाग्य बन जाता है.

साफ़ सुथरे कपड़े पहने व्यक्ति इन्हें घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से देखतें है. उनका गन्दा शरीर और उस पर झूलते चीथड़े तो दिखाई देते हैं परन्तु उनकी आँखों में तैरती गंदगी में मध्य छिपा दर्द किसी को दिखाई नही देता. जब सुबह सुबह कोई माँ अपने बच्चे को साफ़ चमकते कपड़ों में स्कुल बस में चढाने आती है तो वहीँ भटका कोई अनाथ बच्चा उत्सुकतावश उनके पास आ जाता है. इच्छा तो होती है बस एक बार बच्चे के कपडे और स्कुल बैग छूकर देखने की और बहाना होता है भीख मांगने का. झिडक दिया जाता है उसे. बार बार यही क्रम अनेक रूपों में चलता रहता है और इसी बोझ के तले वो कुंठित बच्चा एक दिन अपराध की राह पर धकेल दिया जाता है और यदि वो लड़की हुई तो मानवता को शर्मसार कर देने वाली जिंदगी थोप दी जाती है उस पर.

नहीं. उसे भी हक है इसी सभ्य समाज में एक फूल की भांति विकसित होकर खुशबु बिखेरने का. अपने स्वाभाविक गुणों और शिक्षा के दम पर विकसित होकर सर ऊँचा उठाकर चलने का. राष्ट्र की सेवा करने का.

आईये संकल्प करें की अपने आस पास मौजूद ऐसी किसी अधखिली कली को गंदे, क्रूर, विक्षिप्त मानसिकता वाले हाथों से सुरक्षा दिलाने का और उसे एक मौका देने का ताकि वो विकसित होकर समाज की मुख्य धारा में शामिल हो सके.  

ऐसी व्यवस्था को हम अनाथाश्रम नही बल्कि बाल विकास गृह कहेंगे क्योंकि कहा जाता है की “जिसका कोई नही होता उसका रखवाला भगवान होता है”. फिर किसी को अनाथ कहने का अधिकार किसी को भी नही है. 

 

दुर्भाग्य से मुक्ति और सौभाग्य प्राप्ति चाहिए ?