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वृद्धावस्था

जीवन का वह पड़ाव जब व्यक्ति अपने परिवार की खुशियों के लिए अपना पूरा जीवन खर्च करने के बाद यह आशा रखता है की उसकी संतान भी ह्रदय से उसके साथ ऐसा ही प्रेमपूर्वक व्यवहार करेगी. बढती आयु के आने वाली स्वास्थ्य समस्याओं, अकेलापन में ऐसा ही ध्यान रखा जायेगा जैसा माता पिता उनके बचपन में उनका रखते थे. परन्तु आधुनिक युग की दौड की बलि चढ़ते रिश्तों के मध्य कुछ ही परिवार ऐसे बचे हैं जहाँ बुजुर्गों के साथ ऐसा प्रेम पूर्वक व्यवहार किया जाता है. आज बहुत बड़ी संख्या में बुजुर्ग अपने अंतिम पड़ाव में एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं. कुछ को पुराना कबाड़ मानकर घर से निकल दिया जाता है, कुछ दुर्घटनावश अपने परिवार को खो देते हैं. वैसे तो भारतीय संविधान और  दंड संहिता के अनुरूप ऐसा व्यवहार करने पर उसे अपराध माना जाता है और इसके लिए दंड का भी प्रावधान है परन्तु बुजुर्ग की घर में ससम्मान वापसी तक या परिवार-विहीन वृद्ध व्यक्ति हेतु वृद्धाश्रम की व्यवस्था की जाती है जहाँ न केवल उसके सामान्य जीवन जीने हेतु व्यवस्था की जाती है बल्कि उसके स्वास्थ्य का भी पूर्णतया: ध्यान रखा जाता है.

 

दुर्भाग्य से मुक्ति और सौभाग्य प्राप्ति चाहिए ?