व्यास रचित मां भगवती स्तोत्र

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वैसे तो भगवती की बहुत-सारी स्तुतियां प्रचलित हैं, पर एक स्तुति ऐसी है, जिसमें बेहद कम शब्दों में देवी की महिमा का गुणगान किया गया है. यह है श्री व्यास जी द्वारा रचित मां भगवती का स्तोत्र ...

जय भगवति देवि नमो वरदे, जय पापविनाशिनि बहुफलदे।

जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे, प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥

जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे, जय पावकभूषितवक्त्रवरे।

जय भैरवदेहनिलीनपरे, जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥

जय महिषविमर्दिनि शूलकरे, जय लोकसमस्तकपापहरे।

जय देवि पितामहविष्णुनते, जय भास्करशक्रशिरोऽवनते॥3॥

जय षण्मुखसायुधईशनुते, जय सागरगामिनि शम्भुनुते।

जय दुःखदरिद्रविनाशकरे, जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥

जय देवि समस्तशरीरधरे, जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे।

जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे, जय वांछितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियतः शुचिः।

गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥

भावार्थ :

हे देवि! तुम्हारी जय हो. तुम समस्त शरीरों को धारण करने वाली, स्वर्गलोक का दर्शन कराने वाली और दु:खहारिणी हो. हे रोगों का नाश करने वाली देवि, तुम्हारी जय हो. मोक्ष तो तुम्हारे हाथों में है. हे मनचाहा फल देने वाली, आठों सिद्ध‍ियों से संपन्न देवि तुम्हारी जय हो. जो कहीं भी रहकर पवित्र भाव और नियम-निष्ठा से व्यास द्वारा रचित इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवती सदा उस पर प्रसन्न रहती हैं.

 

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