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संस्थापक

शिव-शक्ति ज्योतिष व पराविज्ञान शोध सेवा केंद्र
में आपका स्वागत है.

 "मानवता की सेवा ही मोक्ष प्राप्ति का प्रथम सोपान है"

        - पूज्य सदगुरुदेव

ज्योतिष विद्या विशारद, वास्तु व तंत्र विशेषज्ञ श्री सचिन्द्र वर्मा :

sachindraसन २०१२ में मानवता की सेवा से प्रेरित होकर ज्योतिष विद्या विशारद, वास्तु व तंत्र विशेषज्ञ श्री सचिन्द्र वर्मा ने शिव-शक्ति ज्योतिष व पराविज्ञान शोध सेवा केंद्र की स्थापना की. अपने बीस वर्ष से भी ज्यादा के अनुभव को जनकल्याण हेतु उपलब्ध कराने हेतु स्थापित इस संस्था का मुख्य उद्देश्य आमजन को प्राचीन भारतीय सनातन परम्परा से परिचित करवाना, उनके जीवन में आने वाली पराभौतिक समस्याओं के स्वरूप को समझा कर उसके  निवारण का मार्ग प्रशस्त करना है. संस्था द्वारा तंत्र मंत्र ज्योतिष अनुष्ठान आदि विभिन्न प्रकल्पों को आवश्यकतानुसार प्रयोग करके जातक के जीवन को सरल और सुखी बनाने हेतु प्रयास किया जाता है.

ज्योतिष विद्या विशारद, वास्तु व तंत्र विशेषज्ञ श्री सचिन्द्र वर्मा के द्वारा पिछले बीस वर्ष से भी अधिक समय में अपने सदगुरू प्रदत्त ज्ञान का उपयोग करके हजारों लोगों के जीवन को बदल कर सुखमय बनाया जा चूका है. देश विदेश में सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च स्तर के गणमान्य जातक इनके संपर्क में आकर जीवन की अत्यंत दुखदायी परिस्तिथियों से मुक्त हो चुके हैं.

ज्योतिष विद्या विशारद, वास्तु व तंत्र विशेषज्ञ श्री सचिन्द्र वर्मा की सबसे बड़ी विशेषता यह है की अपने दीर्घकाल के अनुभव द्वारा वह जातक की समस्या को पहचान कर सर्वश्रेष्ट उपाय का प्रयोग करते हैं. उनको अत्यंत सूक्ष्म जानकारी है की किसी भी जातक की समस्या हेतु हस्तरेखा ज्ञान, मंत्रज्ञान, तंत्र ज्ञान, वैदिक ज्योतिष, सिद्ध यन्त्र निर्माण ज्ञान अथवा वास्तु ज्ञान का उपयोग करना है. अन्य लोगों की भांति वे किसी एक विद्या पर निर्भरता नही रखने के कारण जातक को भ्रमित करने का कार्य नही करते अपितु जातक की समस्या के अनुसार सर्वश्रेष्ट उपाय करवाते हैं. यही कारण है की उनकी सफलता की दर शत प्रतिशत है.

इसके अलावा जनकल्याण की भावना से से प्रेरित होकर संस्था के माध्यम से ज्योतिष विद्या विशारद, वास्तु व तंत्र विशेषज्ञ श्री सचिन्द्र वर्मा विभिन्न जनकल्याण योजनाओं पर भी कार्य करते हैं, जिससे समाज के वंचित हिस्से के जीवन में भी सुख का आगमन हो.

बैशाख शुक्ल के पर्व

यद्यपि वैशाख का हर दिन किसी न किसी व्रत-पर्व के कारण अपना खास महत्व रखता है लेकिन वैशाख शुक्ल पंचमी से एकादशी तक मनोकामना सिद्ध करने वाले व्रत-पर्वों की धूम रहती है। व्रत और पर्व का जहां अध्यात्मिक महत्व है वहीं लौकिक महत्व भी कम नहीं है क्योंकि लोक-धर्म की धारा संतान से ही आगे चलती है। अतः पुत्रदा पंचमी, निम्ब सप्तमी, शर्करा सप्तमी, अपराजिता देवी की उपासना की तिथि वैशाखी अष्टमी, श्री जानकी नवमी तथा मोहिनी एकादशी वैशाख शुक्ल के पर्वों में विशेष महत्व रखते हैं।

पुत्र प्राप्ति व्रतः यह व्रत वैशाख शुक्ल पंचमी से प्रारंभ होकर वर्ष भर में पूर्ण होता है। आरंभ में पंचमी को उपवास करके षष्ठी को स्कन्द कुमार विशाख और गुहका पूजन करें। इस प्रकार प्रत्येक शुक्ल पंचमी और षष्ठी को वर्षपर्यन्त करते रहें तो पुत्रार्थी को पुत्र, धनार्थी को धन और स्वर्गार्थी को स्वर्ग प्राप्त होता है। यह शिवजी का बताया हुआ व्रत है।

निम्ब सप्तमीः वैशाख शुक्ल सप्तमी को स्नान आदि नित्यकर्म करके अक्रोध और जितेन्द्रिय रहकर नीम के पत्ते ग्रहण करें और 'निम्बपल्लव भद्रं ते शुभद्रं तेऽस्तु वै सदा। ममापि कुरु भद्रं वै प्राशनाद् रोगहा भव।' इस मंत्र से एक-एक पत्ता खाकर पृथ्वी पर शयन करें तथा अष्टमी को सूर्यनारायण का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराए। उसके बाद स्वयं भोजन करें।

कमल सप्तमीः इस व्रत के लिए सुवर्ण का कमल और सूर्य की मूर्ति बनवाकर वैशाख शुक्ल सप्तमी को वेदी पर कमल और कमल पर सूर्य की मूर्ति स्थापित कर एवं उनका यथाविधि पूजन करके नमस्ते पद्यहस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते। इस श्लोक से प्रार्थना करके सूर्यास्त से समय एक जल का घड़ा, एक गौ और उक्त कमलादि विद्वानों को दान करें तथा दूसरे दिन उनको भोजन कराकर स्वयं भोजन करें। इस प्रकार प्रत्येक शुक्ल सप्तमी को एक वर्ष करें तो सब प्रकार का सुख प्राप्त होता है।

शर्करा सप्तमी ः यह भी वैशाख शुक्ल सप्तमी को ही होता है। इसके लिए उक्त सप्तमी को सफेद तिलों के जल से स्नान करके सफेद वस्त्र धारण करें। एक वेदी पर कुंकुम से अष्टदल लिखकर 'ॐ नमः सवित्रे' इस मंत्र से उसका पूजन करें।

फिर उस पर खांड से भरा हुआ और सफेद वस्त्र से ढंका हुआ सुवर्णयुक्त कोरा कलश स्थापित करके ऐविश्वदेवमयो यस्माद्वेदवादीति पठयसे। त्वमेवामृतसर्वस्वमतः पाहि सनातन।' इस मंत्र से यथाविधि पूजन करें और दूसरे दिन ब्राह्मणों को घृत और शर्करामिति खीर का भोजन कराकर वह घड़ा दान करें। इससे आयु, आरोग्य और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है।

वैशाखी अष्टमीः इसके निमित्त वैशाख शुक्ल अष्टमी को आम के रस से स्नान करके अपराजिता देवी को उशीर और जटामासी के जल से स्नान कराएं फिर पंचगंध (जायफल, पूगफल, कपूर, कंकोल और लौंग) का लेप करें और गंध पुष्पादि से पूजन करके घी, शक्कर तथा खीर का भोग लगाएं। स्वयं उपवास करें तथा दूसरे दिन नवमी को ब्राह्मण भोजन कराके भोजन करें समस्त तीर्थों में स्नान का फल मिलता है।

 


जानकी नवमीः वैष्णों के मतानुसार वैशाख शुक्ल नवमी को भगवती जानकी का प्रादुर्भाव हुआ था। अतएवं इस दिन व्रत रखकर उनका जन्मोत्सव तथा पूजन करना चाहिए। 'पुन्वितायां तु कुजे नवम्यां श्रीमाधवे मासि सिते हलाग्रतः भुवोऽर्चयित्वा जनकेन कर्षणो सीताविरासीद् व्रतमत्र कुर्यात्‌।'

वैशाख शुक्ल एकादशीः कूर्मपुराण में इस व्रत के नियम-विधान और निर्णय कृष्ण एकादशी की भांति है। इसका नाम मोहिनी है। इससे मोहजाल और पाप समूह दूर होते हैं। भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने इस व्रत को सीता की खोज करते समय किया था। उनके पीछे कोण्डिन्य के कहने से धृष्टबुद्धि ने और श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने किया। इस समय भी सनातन धर्मावलम्बी इस व्रत को बड़ी श्रद्धा से करते हैं।

इसकी एक कथा है, उससे ज्ञात होता है कि मनुष्य का किस प्रकार कुसंग से पतन और सुसंग से सुधार हो जाता है। प्राचीन काल में सरस्वती के तटवर्ती भद्रावती नगरी में श्रुतिमान राजा के सुमन, मेधावी और धृष्टबुद्धि ये पांच पुत्र हुए थे। इनमें धृष्टबुद्धि का कुसंग से पतन हो गया और वह धन, धान्य, सम्मान तथा गृह आदि से हीन होकर हिंसावृत्ति में लग गया। इस दुर्गति से उसने अनेक अनर्थ किए।

अंत में कोण्डिन्य ने बतलाया कि तुम मोहिनी एकादशी व्रत करो, उससे तुम्हारा उद्धार होगा। यह सुनकर उसने वैसा ही किया व्रत के प्रभाव से पूर्ववत्‌ जीवन व्यतीत कर अंत में स्वर्ग में गया।

महाशिवरात्रि 2021

0490fa78919a23085adbd236b5ca642e फाल्गुन मास की महाशिरात्रि का दिन बेहद ही खास होता है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। वैसे तो हर महीने शिवरात्रि आती है लेकिन फाल्गुन मास की चतुर्दशी को आने वाली महाशिवरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है। महाशिवरात्रि शिव और शक्ति के मिलन की रात का पर्व है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार इस दिन व्रत पूजन करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

 
महाशिवरात्रि पूजा सामग्री:
    इस बार महाशिवरात्रि का पावन पर्व 11 मार्च को मनाया जायेगा। इस पावन पर्व पर शिव के साथ माता पार्वती की पूजा भी की जाती है। शिवरात्रि के दिन रात में पूजा करना सबसे फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान शिव की पूजा विशेष सामग्रियों के साथ की जाती है। पूजा जैसे पुष्प, बिल्वपत्र, भाँग, धतूरा, बेर, जौ की बालें, आम्र मंजरी, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, गन्ने का रस, दही, देशी घी, शहद, गंगा जल, साफ जल, कपूर, धूप, दीपक, रूई, चंदन, पंच फल, पंच मेवा, पंच रस, गंध रोली, इत्र, मौली जनेऊ, शिव और माँ पार्वती की श्रृंगार की सामग्री, वस्त्राभूषण, रत्न, पंच मिष्ठान्न, दक्षिणा, पूजा के बर्तन, कुशासन आदि।
 पंचांग अनुसार महाशिवरात्रि का दिन बेहद ही खास होता है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। वैसे तो हर महीने शिवरात्रि आती है लेकिन फाल्गुन मास की चतुर्दशी को आने वाली महाशिवरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है। महाशिवरात्रि शिव और शक्ति के मिलन की रात का पर्व है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार इस दिन व्रत पूजन करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
 
महाशिवरात्रि पूजा सामग्री:
      इस बार यह पावन पर्व 11 मार्च को मनाया जायेगा। इस पावन पर्व पर शिव के साथ माता पार्वती की पूजा भी की जाती है। शिवरात्रि के दिन रात में पूजा करना सबसे फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान शिव की पूजा विशेष सामग्रियों के साथ की जाती है। पूजा जैसे पुष्प, बिल्वपत्र, भाँग, धतूरा, बेर, जौ की बालें, आम्र मंजरी, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, गन्ने का रस, दही, देशी घी, शहद, गंगा जल, साफ जल, कपूर, धूप, दीपक, रूई, चंदन, पंच फल, पंच मेवा, पंच रस, गंध रोली, इत्र, मौली जनेऊ, शिव और माँ पार्वती की श्रृंगार की सामग्री, वस्त्राभूषण, रत्न, पंच मिष्ठान्न, दक्षिणा, पूजा के बर्तन, कुशासन आदि।
 
क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि?
   महाशिवरात्रि पर्व मनाने को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। जिसमें सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार ये पर्व शिव और माता पार्वती के मिलन की रात के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन पार्वती जी का विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक मान्यता ये भी है कि इसी दिन शिव जी 64 शिवलिंग के रूप में संसार में प्रकट हुए थे। जिनमें से लोग उनके 12 शिवलिंग को ही ढूंढ पाए। जिन्हें हम 12 ज्योतिर्लिंग के नाम से जानते हैं।
 
पूजा मुहूर्त: महा शिवरात्रि 11 मार्च दिन बृहस्पतिवार को है। महाशिवरात्रि पूजा का सबसे शुभ समय 12:06 AM से 12:55 AM, मार्च 12 तक है। महाशिवरात्रि पूजा के अन्य शुभ मुहूर्त- रात्रि प्रथम प्रहर पूजा 06:27 PM से 09:29 PM, रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा 09:29 PM से 12:31 AM (मार्च 12), रात्रि तृतीय प्रहर पूजा 12 मार्च 12:31 AM से 03:32 AM, रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा 03:32 AM  से 06:34 AM तक। चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 11 मार्च को 02:39 PM बजे से होगा और समाप्ति 12 मार्च को 03:02 PM बजे। 12 मार्च को शिवरात्रि व्रत पारण समय 06:34 AM से 03:02 PM तक।
 
महाशिवरात्रि पूजा का सबसे शुभ समय 12:06 AM से 12:55 AM, मार्च 12 तक है। महाशिवरात्रि पूजा के अन्य शुभ मुहूर्त- रात्रि प्रथम प्रहर पूजा 06:27 PM से 09:29 PM, रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा 09:29 PM से 12:31 AM (मार्च 12), रात्रि तृतीय प्रहर पूजा 12 मार्च 12:31 AM से 03:32 AM, रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा 03:32 AM  से 06:34 AM तक। 
 
महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर चढ़ाएं जल
महाशिवरात्रि के दिन मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होत है। इस दिन शिवलिंग पर फूल, बेल पत्र, दूध और धतूरा भी चढ़ाया जाता है।
शिव की पूजा तुलसी के पत्ते, चंपा और केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
 
शिवरात्रि की आसान पूजा विधि:
महाशिवरात्रि के दिन सबसे पहले सुबह स्नान करके भगवान शंकर को पंचामृत से स्नान करवाएं। उसके बाद भगवान शंकर को केसर के 8 लोटे जल चढ़ाएं। भगवान शंकर को चंदन का तिलक लगाएं। शिवलिंग पर तीन बेलपत्र, भांग, धतूरा, जायफल, कमल गट्टे, फल, मीठा पान, इत्र, मिठाई व दक्षिणा चढ़ाएं। इसके बाद केसर युक्त खीर का भोग लगा कर प्रसाद बांटें।
 
महाशिवरात्रि पर नौकरी संबंधी परेशानियां दूर करने के उपाय:
महाशिवरात्रि के दिन चांदी के लोटे से भगवान शिव का अभिषेक करें साथ ही ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करें और भगवान शिव पर सफेद रंग के फूल चढ़ाते हुए नौकरी में सफलता, व्यापार में बरकत या मनचाही नौकरी की प्रार्थना करें।
 
महाशिवरात्रि पर आर्थिक दिक्कतों को दूर करने के उपाय:
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को पंचामृत से अभिषेक करें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि, पांचों सामग्री दूध, दही, शक्कर, शहद और घी आपको एक साथ नहीं चढ़ानी है बल्कि इन्हें एक-एक करके भगवान शिव को अर्पित करें। इस दौरान “ॐ पार्वतीपतये नमः” मंत्र का 108 बार स्पष्ट उच्चारण पूर्वक जप करें।
 
महाशिवरात्रि के दिन सुबह 09 बजकर 25 मिनट तक महान कल्याणकारी 'शिव योग' रहेगा। उसके बाद 'सिद्धयोग' शुरू हो जाएगा। शिव योग में किए जाने वाले धर्म-कर्म, मांगलिक अनुष्ठान बहुत ही फलदायी होती हैं। इस योग के किये गए शुभकर्मों का फल अक्षुण्ण रहता है
 
महामृत्युंज्य मंत्र (Mahamrityunjaya Mantra):
ओम् त्रयंम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनं!
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्!!
आयु वृद्धि के लिए- शं हृीं शं !!
विवाह में आ रही बाधा दूर करने के लिए- ओम् ऐं हृी शिव गौरी मव हृीं ऐं ओम् !
शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए-  ओम्  मं शिव स्वरुपाय फट् !

नवपाषाणम

 नवपाषाणम

नवपाषाणम ब्रहमांड की दुर्लभतम वस्तुओ में से एक है । इसको धारण करने वाले जातक को तीव्र अध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होते है। नवपाषाण से विशेष प्रकार की प्रबल उर्जा तरंगे निकलती है जिसे कुछ ख़ास उपकरणों से नापा जा सकता है।
नवपाषाण का निर्माण गोरक्ष संहिता में वर्णित 9 दिव्य रत्नों को एक साथ मिलाकर पारद से सायुज्जिकरण करके दिव्य जड़ी बूटियों के रस से एकाकार कर किया जाता है।
इसमें जिन 9 दिव्य रत्नों का इस्तमाल किया जाता है वो है :-

 

1. गुलाबी स्फटिक (Pink Crytstal )
यह रत्न बहुत ही सकरात्मक ऊर्जा का प्रतीक है और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से संपन्न है। यह हमारे स्नायु तंत्र पर बहुत ही सकारात्मक असर दिखाता है जिससे वो और ज्यादा क्रियाशील और उर्जावान हो जाता है। यह हमारे मानस को शान्ति एवं शीतलता देता है। यह परिवार में प्रेम की बढ़ोत्तरी करता है एवं तनाव को दूर करता है।

2. लाजवर्त (Lapis Lazuli )
इस रत्न में आश्चर्यजनक सकरात्मक और रक्षात्मक ऊर्जा विद्यमान है। यह पारद के साथ बद्ध होकर पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। यह नवग्रह के दोषो को दूर करता है एवं असाध्य रोगों को भी मिटाता है। यह दिव्य रत्न हमारी चेतना को ऊपरी आयामो और दिव्य लोको से जोड़ता है। साथ ही यह विशुद्धि चक्र और तीसरे नेत्र को जागृत करता है।

3. जंगली माणिक ( Jungle Ruby )
यह रत्न सूर्य से सम्बंधित है और यह ओज, तेजस्विता और ऊर्जा प्रदान करता है। यह पारद के साथ बद्ध होकर सम्पूर्ण कार्यो में सफलता दिलाता है और इच्छापूर्ति करता है। यह मूलाधार को जागृत कर कुण्डलिनी को जागृत करता है। इसके प्रभाव से शांत मन, आत्म विश्वास एवं ध्यान प्राप्त होता है।

4. मोती (Pearl )
यह चंद्र से सम्बंधित रत्न है जिसका सम्बन्ध मन से है। यह पारद से बद्ध होकर चंचलता को दूर करके मन को शांत एवं नियंत्रित करता है। इसके धारण से मन में सकरात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।
यह आँखों एवं मस्तिष्क के सभी रोगों को दूर करता है । इससे आकर्षण शक्ति प्राप्त होती है।

5. हरिताश्म (Jade Stone )
यह रत्न जीवन में कामनाओ की पूर्ती और विघ्न बाधाओ का नाश कर भाग्य जगाता है। पारद के साथ बद्ध होकर यह धारक को कई दिव्य शक्तिया को देता है। इससे व्यक्ति के अंदर श्राप औऱ वरदान देने की शक्ति आती है। साथ ही यह समस्त तंत्र दोष को दूर करता है। यह रत्न इतर और दिव्य योनि के संपर्क करने में भी सहायक होता है और इससे आध्यात्मिक अनुभूतिया बहुत शीघ्र प्राप्त होती है। यह अनाहत चक्र को जागृत करता है और प्रेम का संचार करता है।

6. नीलपाषाण रत्न (Kyanite Clearstone )
यह रत्न मंगल ग्रह से सम्बंधित है और पारद के साथ होकर यह मंगल ग्रह के समस्त दोष समाप्त करता है। इसके धारण करने से विवाह में देरी, क्रोध, जमीन और कर्ज सम्बंधित कार्यो को सही करता है। इसके धारण करने से राजकीय सम्मान और सरकारी कार्यो में सफलता मिलती है। आध्यात्मिक रूप से यह तीसरे नेत्र को जागृत करता है और टेलीपैथी, मानसिक शक्तियो को जागृत करता है। यह शक्तिपात को करने और प्राप्त करने में दोनों रूप से सहायक है।

7. दुर्लभ हरा स्फटिक ( Green Aventurine)
यह एक दिव्य रत्न है जिसे रैकी में भी बहुतायत से उपयोग किया जाता है। यह नकरात्मक शक्तियो को सकरात्मक बनाने में विशेष रूप से प्रभावी है। इसके बारे में कहा जाता है की अगर किसी आत्महत्या करने पर उतारू किसी व्यक्ति को यह धारण करा दिया जाए तो वह आत्महत्या का विचार छोड़ देता है। पारद के साथ संयुक्त होकर इसके धारक की ऊर्जा और आभामंडल बहुत ज्यादा विस्तारित हो जाता है। यह नकरात्मक शक्तियो को दूर करता है। इससे कुण्डलिनी की ऊर्जा जागृत होती है और चक्र स्पंदित होते है। यह रत्न आत्म अनुभूति और आध्यात्मिक पथ में विशेष रूप से सहायक है।

 

8. दुर्लभ सल्फर कॉपर स्फटिक (Sulphur Stone Copper )

इस रत्न में ताम्र होता है और इस रत्न से नाभि चक्र विशेष सक्रिय हो जाता है जिससे पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त होता है। साथ ही पारद से संयुक्त होकर यह वशीकरण और टेलीपैथी शक्ति प्रदान करता है। इससे शरीर के विषैले तत्व बाहर निकल जाते है।

 

9. प्राकृतिक ताम्र सत्व ( Natural Copper)
यह एक दिव्य सत्व है क्योंकि प्राकृतिक ताम्र सत्व विशेष शक्तिया समेटे हुए होता है। यह किसी भी विष को दूर करके एक स्वस्थ शरीर प्रदान करता है। यह सभी चक्र ऊर्जाओं को जागृत करता है और इसका शरीर पर प्रभाव चमत्कारी है।

यह सभी 9 रत्न पारद के साथ मिलकर दिव्य नवपाषाणम का निर्माण करते है।
 

 

नवपाषाणम के लाभ :-

1. नवपाषाण अत्यधिक शक्तिशाली एवं उर्जात्मक है । उपरोक्त 9 रत्नों के सभी लाभ इस गुटिका में समाहित हो जाते है।

2. नवपाषाण नवग्रह के सभी दोष दूर कर पूर्ण सकरात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।

3. नवपाषाण आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाती है और चक्रो को स्पंदित करती है। इससे कुंडलिनी का जागरण होता है।

4. नवपाषाण गुटिका मुख में धारण करने से सभी रोगों को नाश होता है और स्वस्थ शरीर की प्राप्ति होती है।

5. नवपाषाण धारण करने से किसी भी तंत्र मंत्र या काला जादू का प्रयोग काम नही कर पाता। यह पूर्ण रूप से सुरक्षा प्रदान करती है।

6. नवपाषाण धारण करने से टेलीपैथी, वशीकरण, उच्च योनियों से संपर्क, स्वास्थ्य शरीर आदि स्वतः प्राप्त हो जाते है।

7. गोरक्ष संहिता के अनुसार इसके धारण करने से कुंडली के मंगल दोष, पितृ दोष , काल द्रमुक दोष , काल सर्प दोष और बहुत से दोष दूर हो जाते है।

8. नवपाषाण धारण से पूर्ण सकरात्मक ऊर्जा, तीव्र मस्तिष्क , स्वस्थ शरीर की प्राप्ति होती है।

9. यह साधना में विशेष रूप से फलदायी है और इच्छाओं और सफलता की प्राप्ति करती है।

 

अंत मे यही कहा जा सकता है कि इसको धारण और प्राप्त करना पूर्ण सौभाग्य को जागृत कर हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना है।

नवपाषाणम के द्वारा गुटिका, माला, शिवलिंग एवं श्रीयंत्र आदि विग्रह बना कर इसको धारण अथवा स्थापन करके पूजन किया जा सकता है.

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नवपाषाणम शिवलिंग

नवपाषाणम शिवलिंग का महत्त्व पारदेश्वर शिवलिंग की भांति होता है. अपितु पारद शिवलिंग से भी ज्यादा लाभ कोई दे सकता है तो वह है नवपाषाणम शिवलिंग. 

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नवपाषाणम माला
नवपाषाणम के मणकों से बनी बनी माला को धारण करने से उच्च स्तर के अध्यात्मिक एवं आयुर्वेदिक लाभ उठाये जा सकते हैं . 54 अथवा 108 मणकों की माला से जाप करने पर न केवल पारद माला के लाभ मिलते हैं अपितु नौ दिव्य प्राकृतिक रत्नों की उर्जा का लाभ भी मिलने लगता है.

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नवपाषाणम गुटिका

नवपाषाणम गुटिका को गले या कलाई में धारण करके इसका लाभ उठाया जा सकता है.

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नवपाषाणम  विग्रह

नवपाषाणम माला
नवपाषाण के मणकों से बनी बनी माला को धारण करने से उच्च स्तर के अध्यात्मिक एवं आयुर्वेदिक लाभ उठाये जा सकते हैं . 54 अथवा 108 मणकों की माला से जाप करने पर न केवल पारद माला के लाभ मिलते हैं अपितु नौ दिव्य प्राकृतिक रत्नों की उर्जा का लाभ भी मिलने लगता है. इस माला को गले में धारण करके ध्यान लगाने से साधक के प्रभामंडल में सकारात्मक एवं दिव्य परिवर्तन होने लगते हैं. उसके प्रभामंडल का विस्तार होने लगता है. इसके साथ ही उसकी कुंडलिनी में जागरण क्रिया प्रारंभ होने लगती है.

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नवपाषाणम शिवलिंग

नवपाषाण शिवलिंग का महत्त्व पारदेश्वर शिवलिंग की भांति होता है. अपितु पारद शिवलिंग से भी ज्यादा लाभ कोई दे सकता है तो वह है नवपाषाण शिलिंग. नवपाषाण से निर्मित बाणलिंग या शिवलिंग को अपने निवास या व्यावसायिक स्थल पर प्राण प्रतिष्ठा कर स्थापित करने पर पुरे स्थल के वास्तु दोष समाप्त होने लगते हैं. उसकी निश्चित परिधि में निवास करने वाले जीवों के पाप क्षय होने लगते हैं और उसके जीवन में शुभता का विस्तार होने लगता है. शिवलिंग का विशेष अवसरों पर रुद्राभिषेक और प्रतिदिन जलाभिषेक करने वाले व्यक्ति का जन्म जन्मान्तर के प्रारब्ध के दुष्फलों का नाश होकर भाग्योदय होने लगता है. 

नवपाषाण शिवलिंग का जलाभिषेक करके उसको प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने पर व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर, प्राण कोष में अद्भुत परिवर्तन आने लगते हैं जिससे उसके प्रभामंडल में दिव्यता उत्पन्न होने लगती है और शरीर की कोशिकाओं में विषैले तत्वों का क्षरण होकर उसको अद्भुत अध्यातिमिक एवं शारीरिक अनुकूलता प्राप्त होने लगती है और आयु का प्रभाव उसके शरीर पर धीमा हो जाता है. 

नवपाषाणम श्रीयंत्र

नवपाषाण श्रीयंत्र भी एक अद्भुत विग्रह होता है. कहा जाता है की किसी भी साधक के घर में पारद श्रीयंत्र की स्थापना होना ही उसके लिए सौभाग्य जागृत होने के लक्षण होते हैं. और उससे भी बढ़ कर यदि नवपाषाण श्री यन्त्र की स्थापना हो जाये तो सोने पर सुहागा. पारद के साथ अद्भत प्राकृतिक तत्वों का संयोजन साधक को न केवल श्री यन्त्र पूजन से केद्रित होने वाली दिव्य उर्जा का लाभ दिलाता है अपितु उनके साथ उर्जावान दिव्य रत्नों का भी लाभ मिलने लगता है. इस पर तंत्र क्षेत्र की सभी प्रकार की साधनाएं की जा सकती हैं और अगर भूलवश कोई त्रुटी हो जाये नवपाषाण श्रीयंत्र उस त्रुटी के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली नकारात्मक उर्जा जो उसी क्षण अवशोषित करके साधक की रक्षा कर लेता है.

  

==> नवपाषाण गुटिका / माला प्राप्त करने हेतु संपर्क करें 
(नवपाषाण का निर्माण पूर्णरुपेन शास्त्रसम्मत विधि द्वारा किया जाता है. अत: इसके निर्माण प्रक्रिया में लगभग एक माह का समय लगता है.)